Saturday, January 5, 2013

तोमर आपका आदमी नहीं था, नेताजी!


(This blog post was first published as a Facebook note on December 26- 3 days after Delhi police constable Subhash Tomar passed away due to injuries allegedly sustained by him during the anti-rape protests in Delhi. On Jan 2, a plea was filed in Delih HC for a CBI probe into Tomar's death. Read more about it here) 

जय हो, हमारे नेताओं की! जय हो उन लोगों की जिन्हें एक दिन पहले जनता से बात करने में न जाने कैसी शर्मिंदगी महसूस हो रही थी।  

अब वो सारे इकठ्ठा है तोमर के लिए। ये वही कांस्टेबल है जो लोगों के गुस्से से आपको बचा रहा था। ये वही है जिसे आपने अपने महलनुमा घर में सुरक्षित बैठे- बैठे एक लाठी देकर ये कह दिया कि जाओ, जब कोई कमज़ोर दिखे तो पीट दो और जब गुंडे दिखें तो देख लेना भई कि कैसे बचना है। 

एक लाठी के साथ तोमर इस कोशिश में लगा था कि कहीं आपको चोट न लग जाए। अरे चोट तो दूर की बात है, वो और उनके सहकर्मी ज़्यादातर ये सुनिश्चित करने में लगे थे कि कहीं आपकी नींद न खराब हो जाए या कहीं आपके बागीचों के फूल न नष्ट हो जायें! 

अब पूरे स्टेट ऑनर के साथ उस कांस्टेबल को विदा कर रहे हैं। ये दर्शा रहे हैं कि देखो, तुम सब कितने मूर्ख, जाहिल और खून के प्यासे हो और हम कितने सभ्य और सुसंस्कृत! वो हमारे लिए मर गया और हमने उसे शहीदों की विदाई दी। हो गया न हिसाब बराबर? 

नेताजी, इतना आदर करते हैं न कांस्टेबल का? एक काम कीजिये। ये जो एक दिन की तनख्वाह तोमर के परिवार को दे रहे हैं न, ये अपने पास ही रखिये। लेकिन तोमर की बिटिया या नतनी या पोती की पढाई का खर्च आप उठा लीजिये। और हाँ, तोमर के सहयोगियों की तनख्वाह बढ़ा दीजिये। अपनी तनख्वाह में से हर महीने ज़रा सा कम घर ले जायेंगे तो मर नहीं जायेंगे आप। 

एक और बात। अपने नाटक पर पर्दा गिरा लीजिये। जनता के पैसों से तोमर के लिए महँगी विदाई का नाटक कर कांस्टेबलों पर अपना हक़ जताने बंद कीजिये। 

तोमर एक अधेढ़, लाठीधारी, बिना कवच, बिना ट्रेनिंग, बुरी पगार पाने वाला ऐसा सिपाही था जो आपकी चालाकी, खुदगर्जी और निर्दयीनता का उतना ही बड़ा शिकार था जितना की हम।   

तोमर हमारा आदमी था। #ठीकहै?

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